Saturday, 29 August 2026

जातिगत जनगणना और ओबीसी को उनकी जनसंख्या में के आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर 5 मार्च को जयपुर में जाटों का महाकुंभ


जातिगत जनगणना और ओबीसी को उनकी जनसंख्या में  के आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर 5 मार्च को जयपुर में जाटों का महाकुंभ

राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण की मांग को लेकर 5 मार्च को जयपुर में जाट समाज का महाकुंभ होने वाला हैं। इस महाकुंभ की मुख्य मांग प्रदेश में भी जातिगत जनगणना करवाना और ओबीसी को उनकी जनसंख्या में  के आधार पर आरक्षण देना रहेगी

वर्तमान में  प्रदेश में ओबीसी को सरकारी नौकरियों में 21 प्रतिशत आरक्षण है, जिसे बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने की मांग की जा रही है। इसके लिए जातिगत जनगणना करवाकर हर जाति-समाज के अलग-अलग आंकड़े जुटाने की मांग तेजी से बढ़ रही है। फिलहाल देश में जातिगत जनगणना करवाने का कोई प्रावधान नहीं है। इस मांग से राजस्थान की आबादी में सीधे तौर पर 50-55 प्रतिशत लोग प्रभावित हो रहे हैं।  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार के सामने इस मांग पर कोई निर्णय लेना एक चुनौती का काम है।जातिगत जनगणना का समर्थन या विरोध करना भाजपा के लिए भी आसान काम नहीं है।

राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील ने बताया कि जातिगत जनगणना सरकार को करवाने का फैसला करना ही चाहिए। बिना जातिगत जनगणना के किसी जाति के कितने लोग हैं, उन्हें कितना प्रतिनिधित्व और कितनी संरक्षण मिलना चाहिए, यह तय ही नहीं हो सकता। न्यायसंगत आरक्षण और प्रतिनिधित्व तभी संभव है, जब जातिगत जनगणना करवाई जाए। हमारी मुख्य मांग जातिगत जनगणना करवाना और उसके अनुसार ओबीसी का आरक्षण कम से कम 27 प्रतिशत किया जाना चाहिए। जाट महाकुंभ के लिए प्रदेश के सभी सांसदों-विधायकों को भी न्योता भेजा गया है।

जातिगत जनगणना की देशभर में मांग ज्यादातर ओबीसी समाज से आने वाले राजनेता या सामाजिक नेता कर रहे हैं। ओबीसी में चूंकि सर्वाधिक जातियां (किसी-किसी प्रदेश में तो 250 से ज्यादा भी) शामिल हैं। ऐसे में इस वर्ग की संख्या जैसे राजस्थान में लगभग 50-55 प्रतिशत है, उसी तरह से अन्य राज्यों में इस वर्ग का आकार विशाल है।

ऐसे में भाजपा-कांग्रेस को इस वर्ग को अपने पक्ष में रखना बहुत जरूरी है। अगर उनकी मांग को ठुकराया जाता है, तो 50 प्रतिशत तक का वोट बैंक खिसक सकता है।वर्ष 2006 में गुर्जर समुदाय ने राजस्थान में आरक्षण आंदोलन ओबीसी से बाहर निकलने और एसटी में शामिल होने की मांग को लेकर किया था। हाल ही दौसा-भरतपुर क्षेत्र में भी माली-कुशवाहा समाज ने ओबीसी से बाहर निकलने की मांग की है।

राजस्थान की राजनीति में ओबीसी समुदाय बहुत प्रभावशाली है। प्रदेश में 200 में से करीब 60 विधायक और 11 सांसद ओबीसी समुदाय से आते हैं। 8 करोड़ की आबादी में से चार करोड़  ओबीसी समुदाय की है उसमें जाट, माली, कुमावत, यादव 50 प्रतिशत है ।

मौजूदा स्थिति में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजस्व मंत्रीरामलाल जाट, कृषि मंत्री लालचंद कटारिया , वन मंत्री हेमाराम चौधरी, उद्योग मंत्री शकुंतला रावत, खेल  राज्यमंत्री  अशोक चांदना और गृह राज्य मंत्री राजेंद्र सिंह यादव इसी समुदाय के विधायक मंत्री बने हुए हैं। केन्द्र में भी केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेन्द्र यादव और  केंद्रीय कृषि कल्याण  राज्यमंत्री कैलाश चौधरी ओबीसी समुदाय से हैं।200 में से लगभग 150 विधानसभा सीटों पर ओबीसी मतदाताओं की अनुमानित संख्या पहले, दूसरे या तीसरे-चौथे नंबर पर रहती है। केवल दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, उदयपुर, सिरोही, राजसमंद और बारां जैसे जिलों की लगभग 50 विधानसभा सीटों पर ओबीसी समुदाय की स्थिति कमजोर है।

25 लोकसभा सीटों में से वर्तमान में सीकर, चूरू, अलवर, झुंझुनूं, नागौर, अजमेर, टोंक-सवाईमाधोपुर, जालोर-सिरोही, जैसलमेर-बाड़मेर, पाली, बारां-झालावाड़ 11 लोकसभा क्षेत्र पर ओबीसी समुदाय के सांसद हैं। इनमें से 7 सीटों पर जाट हैं। इन सांसदों में भागीरथ चौधरी (अजमेर), दुष्यंत सिंह (बारां-झालावाड़), कैलाश चौधरी (जैसलमेर-बाड़मेर), सुमेधानंद सरस्वती (सीकर), नरेंद्र कुमार (झुंझुनूं), राहुल कस्वा (चूरू) और हनुमान बेनीवाल (नागौर) शामिल हैं। महंत बालकनाथ (अलवर), पीपी चौधरी (पाली), देवजी पटेल (जालोर-सिरोही) और सुखबीर सिंह जौनापुरिया (टोंक-सवाईमाधोपुर) भी ओबीसी वर्ग से ही आते हैं।





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