Saturday, 29 August 2026

वैश्विक न्याय की स्थापना में अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए समानता का भा और अहिंसा की आत्मनीति जरूरी है : प्रो. कल्पना एस. अग्रहारी


वैश्विक न्याय की स्थापना में अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए समानता का भा और अहिंसा की आत्मनीति जरूरी है : प्रो. कल्पना एस. अग्रहारी

कुमांऊ विश्वविद्यालय, नैनिताल की राजनीति विज्ञान विभाग प्रो. कल्पना एस. अग्रहारी ने कहा कि गांधीजी का जीवन अपने आप में एक प्रमाण है और गांधी का एक कथन सदैव प्रासंगिक है कि अन्याय के खिलाफ सदैव खड़े रहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान विश्व में अन्याय की स्थिति बनी  हुई है क्योंकि शक्ति का दर्शन अधिक प्रभावी हो गया है। वैश्विक न्याय की स्थापना में अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए समानता का भावजिसमें अहिंसा की आत्मनीति जरूरी है। 

गांधी अध्ययन केन्द्र राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में "आधुनिक समय में गांधी की प्रासंगिकता' विषयक व्याख्यान का आयोजन में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि गांधीजी द्वारा समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, पर्यावरण सुरक्षा आदि के संबंध में जो दर्शन प्रतिपादित किया गया, आज भी उसे अपनाने की महती आवश्यकता है। गांधी बहुसंस्कृतिवाद के साथ-साथ महिला उत्थान एवं लैंगिक समानता के समर्थक रहें। उन्होंने कहा कि गांधी का गोल्डन रूल था कि जो सबके  लिए नहीं मेरे लिए  भी नहीं गांधी जी ने हरिजन में लिखा था कि युवाओं में प्रचण्ड ऊर्जा है लेकिन भविष्य के प्रति असुरक्षा उनके आक्रोश एवं निराशा का बड़ा कारण है।

प्रोफेसर अग्रहरि ने कहा कि प्रत्येक महल जिसे भारत में देखते है, वह देश की समृद्धि का चिन्ह नहीं है। यह उस सत्ता के मद का चिन्ह है, दौलत कुछेक की देवी थी। इन कुछेक लोगों के हाथ में यह दौलत भारत के लाखो गरीबों की उस कड़ी मेहनत के बल पर आती है। यह अन्याय है, यह सत्य और अहिंसा के आदर्श से काफी दूर है। नई दिल्ली के महलों और उनके बगल में बसी हुई गरीब मजदूर बस्तियों के बीच में जो दर्दनाक भेद नजर आता है वह स्वराज्य में एक दिन नहीं टिकेगा"।

केन्द्र के निदेशक डॉ. राजेश कुमार शर्मा ने कहा कि गांधी दर्शन का मूलमंतव्य उनके दर्शन में छुपा हुआ है। किसी भी समय की व्यवस्था में उत्पन्न आंदोलन को देखने पर प्रतीत होता है कि उस पर तत्कालीन समय का प्रभाव अधिक होता है। गांधी का भारत या भारत का गांधी की संकल्पना इस बात को सिद्ध करती है। गांधीजी द्वारा उनके सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त किए गए प्रयोग आज भी इसलिये प्रांसगिक प्रतीत होते है क्योकि उन्होने सैद्धांतिक परिपेक्ष्य के स्थान पर व्यवहारिक रूप से उसका अभ्यास किया। वर्तमान में अत्मनिर्भर भारत की संकल्पना तथा नई शिक्षा नीति कहीं ना कहीं गांधी की बुनियादी शिक्षा और गांधी के ग्राम स्वराज के दर्शन पर आधारित है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. एस.टी. गुप्ता ने कहा कि गांधी ऐसे विचारक रहे हैं जिनके सिद्धांत निर्माण एवं व्यवहार अन्तर रहा लेकिन कथनी और करनी एक रही। उन्होने साम्य और साधनों की पवित्रता पर बल दिया। गांधी ने अपने सम्पूर्ण जीवन में अहिंसात्मक व्यवस्था को अपनाया। गांधीजी द्वारा लोकतंत्र की अवधारणा की सार्थकता ग्राम स्वराज पर इसलिये आधारित की गयी क्योंकि स्थानीय समस्याओं का स्थानीय आवश्यकताओं द्वारा निदान सर्वोतम तरीके से समय है।

कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी राजेश कुमार शर्मा ने किया। इस अवसर पर डॉ. गिरिजा जोशी, डॉ. मुकेश वर्मा, डॉ. हंसा चौधरी, डॉ. सुमन वर्मा, डॉ. दीपक अवस्थी, डॉ. मुरारी शर्मा, रविकेश अंजू मादव, तनवी, राम प्रसाद प्रियंका नवदीप, वीरू भीम सिंह सैनी, चमन सहित अनेक शिक्षक एवं शोधार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के अन्त में हंसा चौधरी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।




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