Saturday, 29 August 2026

अब शब्दों को चुन-चुन कर बुनने वाले गुलजार साहब


अब शब्दों को चुन-चुन कर बुनने वाले गुलजार साहब

अपनी किताब 'ए पोएम ए डे' के बारे में गुलजार ने कहा कि  शायर सिर्फ अपनी बात नहीं करता है और न ही उसे कहनी चाहिए। उसे हमेशा दूसरों के दर्द को बयां करना अपना फर्ज समझना चाहिए। कविता-शायरी को टेक्स्ट बुक तक सीमित कर दिया गया है, यह टेक्स्ट बुक से बाहर एक जिन्दगी की तरह है और उतनी ही जिन्दा है, जितने आप जिन्दा हैं। इस बुक में एक कविता है, लेमिनेशन। यह शेफाली देव वर्मा की रचना है, जिसमें उन्होंने कागज के लेमिनेशन को जज्बात के साथ जोड़ा है।

इस दौरान गुलजार ने नज्म पढ़कर सुनाई-

मैं नज़्में ओढ़कर बैठा हुआ हूं,

ठिठुरने लगता हूं,

कोना उठता है कोई जब कहीं से,

किसी मिसरे के अंदर झांक कर छूता है कोई,

मेरे नंगे बदन पर कपकपी दौड़ जाती है।

मुझे जब चोट लगती है, एक नई नज्म लिख का ओढ़ लेता हूं।

काश मेरी 5 प्रतिशत भी जावेद साहब जितनी याददाश्त मिली होती। आज मुझे बुक देखकर पढ़नी नहीं पढ़ती। अंग्रेजी जितनी नेशनल भाषा है, वैसे ही हमारी अन्य भाषाएं भी नेशनल हैं। जिन्हें रीजनल नाम दिया गया है। मराठी, तमिल जैसी भाषाएं भी नेशनल हैं। इन्हें क्लासिकल लेंग्वेज का दर्जा मिला हुआ है।

मेरी बुक में देश भर के कवियों के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के कुछ महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं से चुनकर बुना गया है। इसमें 365 दिनों के हिसाब से प्रत्येक दिन एक कविता को समर्पित है। इसमें 279 कवियों और 34 भाषाओं के कवि/ कवयित्रियों को यहां शामिल किया है। इसे तैयार करने में 9 साल लगे। इसे भारतीय जुबान में लिखा गया है।




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