


जर, जौरु और जमीन की वजह से पुरुष आदतन अपराधी होता है महिला तो अपराधी होती ही नहीं है। महिला अपराध तब करती है जब उसकी कोई मजबूरी होती है। हमारा समाज पुरुष आदीपथ्य का अधीन है। कानून लागू करने की व्यवस्था ही मर्दाना है महिला तो उसके केंद्र में है ही नहीं। पुरुष की मानसिकता है कि मेरे घर की महिला सम्मानीय और आदरणीय है और मेरे घर से बाहर की महिला पर मेरा अधिकार है। पुरुष ने हमेशा महिला के ऊपर अपना अधिकार जमाने की कोशिश की है।
हिंदुस्तान में ही महिलाओं की स्थिति खराब नहीं है अमेरिका में वोटिंग अधिकार 1996 में आया। कुछ पश्चिमी देशों में जिनका हम अनुसरण करते है वहाँ महिलाओं को जींस पहनने का अधिकार 2006 में मिला । यह हर देश और हर घर की कहानी है कि महिलाओं के साथ किसी ना किसी तरीके से भेदभाव होता आया है।
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी डॉ केपी सिंह बतौर वक्ता डॉ. बी.आर. अम्बेडकर राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय एवं राष्ट्रीय महिला आयोग, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 'महिला पुलिस स्टेशन: कार्यप्रणाली, दक्षता और प्रभावशीलता’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में सोमवार को अपने विचार प्रकट करते हुए यह बात कही ।
संगोष्ठी में हरियाणा पुलिस एकेडमिक मधुबन की आईजीपी डॉ. सुमन मंजरी और कुलसचिव डॉ. अमित कुमार वक्ता के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति डॉ. अर्चना मिश्रा ने की। कुलपति ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।
डॉ. सिंह ने कहा कि ज्यादातर थाना यह मानने को तैयार ही नहीं है कि महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। क्योंकि उन्हें अपनी आँख के नीचे कुछ दिखाई ही नहीं देता और महिलाओं की दशा देखने के लिए जमीन पर नजर गड़ानी पड़ती है क्योंकि महिला की नजर जमीन से ऊपर उठती नहीं है। उन्होने आगे कहा कि कोई भी महिला थाने में आती है तो पूरे थाने के लिए मनोरंजन का साधन हो जाती है। उससे कई तरह के सवाल पूछे जाते है। उसे इज्जत व विश्वास का वातावरण देने की बजाय डराने का कार्य करते है। पहला महिला थाना 1995 में सोनीपत में बना था। उसके बाद हरेक जिले में महिला थाना स्थापित किए गए।
आईजीपी डॉ. सुमन मंजरी ने भारतीय संविधान के तहत प्रत्येक महिला को दिए गए मूल अधिकारों और उनके खिलाफ किए गए किसी भी अपराध के खिलाफ उपलब्ध विभिन्न कानूनी उपायों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महिला पुलिस थाने में महिला उत्पीड़न के न्याय की आवाज़ बनना महत्वपूर्ण है। उन्होंने छात्रों को नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ जागरूकता अभियान, महिलाओं के लिए कानूनी सहायता क्लीनिक और आपदा पीड़ितों के लिए पुनर्वास के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया।
डॉ. मंजरी ने सखी शब्द को परिभाषित करते हुए कहा कि महिला पुलिस और पीड़िता दोनों सखी बन जाए तो अन्याय से न्याय भी हो जायेगा। उन्होने बताया कि स्त्री के अंदर पुरुष के गुण आ जाते है तो वह कुल्टा बन जाती है और पुरुष में स्त्री का गुण आ जाते है तो वह देवता बन जाता है इसलिए स्त्री को पुरुष बनने की तरफ नहीं बढ़ना चाहिए।
कुलपति डॉ. मिश्रा ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि वर्तमान समय में हमारे पूर्व के दौर को देखते हुए समाज मे, पारिवारिक मूल्यों में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है, जिसके कारण आये दिन पारिवारिक झगड़े- विवाद आदि देखने को मिलते हैं। तो ऐसे परिवेश में महिला थाना एवं महिला हेल्प डेस्क तथा महिला पुलिस कर्मियों की उपयोगिता और महत्व और ज्यादा बढ़ गया है साथ ही जिम्मेदारियां भी बढ़ी है, जिसके लिये पुलिस को महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता के साथ व्यवहार करते हुए और ज्यादा दक्षता के साथ अपनी कार्यप्रणाली को और बेहतर करने के लिये हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए।
कुलसचिव डॉ अमित कुमार ने कहा कि महिला आयोग एवं पुलिस एक दूसरे से पूरी तरह जुड़े रहकर आपसी समन्वय के साथ कार्य कर रहे है और पीड़िता का पहला संपर्क पुलिस के साथ ही होता है। अतः प्रत्येक पीड़ित के प्रति हमारा व्यवहार संवेदनशील एवं सौम्य होना चाहिए। सर्वप्रथम पीड़िता को पारिवारिक माहौल प्रदान कर, उनकी समस्याओं को सुनना है, फिर उनकी समस्या के निराकरण का प्रयास करना है। और उनकों विधिक सहायता या अन्य प्रकार की सहायता के लिये अन्य शासकीय व अशासकीय संस्थाओं द्वारा समन्वय स्थापित करना चाहिए।
इंचार्ज लॉ डॉ अमित गुलेरिया ने सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का सफल संचालन छात्रा सौम्या व छात्र उत्सव द्वारा किया गया। इस दौरान विवृति पुस्तिका का विमोचन भी किया गया। संगोष्ठी में आस-पास के गाँव की महिला सरपंच, पंच व अन्य महिलाएं भी शामिल हुई है। कार्यक्रम के बेहतर प्रबंधन में छात्र-छात्राओं की विशेष भूमिका रही।