


कांग्रेस के विधायकों द्वारा सामूहिक रूप से इस्तीफा देने के 2 सप्ताह बाद भाजपा का शिष्टमंडल प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया के नेतृत्व में मंगलवार को विधानसभा अध्यक्ष डॉ.सीपी जोशी से मिला था। इस शिष्टमंडल ने डॉ. सीपी जोशी से कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने की मांग की गई थी। शिष्टमंडल में प्रतिपक्ष के नेता कटारिया ने भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को शामिल नहीं करना यह कोई मानवीय भूल है या फिर रणनीति का नया पैंतरा ! इसका जवाब तो प्रतिपक्ष के नेता कटारिया और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. पूनिया ही दे सकते हैं।
पूर्व सीएम राजे मंगलवार को जयपुर में ही मौजूद थे और उन्होंने मंगलवार को खोले के हनुमान जी और मोती डूंगरी गणेश जी के दर्शन कर अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराई थी। यही नहीं सोशल मीडिया के माध्यम से उन्होंने इस बात का प्रचार-प्रसार भी खूब किया कि वे जयपुर में ही मौजूद हैं। इस सब के बावजूद भाजपा सिर्फ मंडल में शामिल नहीं होना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। यह बात भी सही है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. जोशी का सरकारी निवास भी पूर्व सीएम राजे के सरकारी निवास के ठीक सामने हैं । विधानसभा अध्यक्ष डॉ. जोशी को ज्ञापन देने वालों में प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया, भाजपा विधायक दल के उप नेता राजेंद्र राठौड़, सचेतक योगेश्वर गर्ग, अजमेर उत्तर से विधायक वासुदेव देवनानी, चंद्रकांता मेघवाल अभिनेश महर्षी, निर्मल कुमावत और अविनाश गहलोत सहित कुछ अन्य विधायक भी शामिल थे।
आखिर विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात में पूर्व सीएम राजे को शामिल नहीं करना भाजपा की आंतरिक कलह को उजागर करता है। स्थिति चाहे कुछ भी हो रही हो लेकिन जब विधानसभा में भाजपा के विधायक सरकार को घेरने की रणनीति तैयार करते हैं तो पूर्व सीएम राजे को शामिल किया जाता है। यही नहीं विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी के कक्ष में धरना देने का काम होता है तो अभी वसुंधरा मौजूद रहती है।
शिष्टमंडल में पूर्व सीएम राजे को शामिल नहीं करना किस की रणनीति पर काम किया जा रहा है यह कोई बताने के लिए तैयार नहीं है। हाल ही में पार्टी के प्रभारी अरुण सिंह यह कहकर गए थे कि पूर्व सीएम राजे पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है और वह देव दर्शन यात्रा कर सकती हैं। लेकिन उन्होंने कभी मना नहीं किया होगा कि जब भाजपा विधायक दल का शिष्टमंडल विधानसभा अध्यक्ष डॉ. जोशी से मिलने जाए तो राजे का नाम उसमें शामिल मत करना। चर्चा चाहे कुछ भी हो लेकिन यह बात सही है कि आने वाले समय में भाजपा की एकता को लेकर निश्चित तौर पर एक सवाल पैदा करता है। भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। प्रभारी अरुण सिंह यह दावा करके गए थे कि पार्टी में एकता है और हम चुनाव मिलकर लड़ेंगे और चुनाव में भाजपा प्रचंड बहुमत प्राप्त करेगी । उनके जाते ही यह सब कुछ नया नजारा क्या उजागर करता है।
हाल ही में वसुंधरा राजे ने बीकानेर संभाग की यात्रा की थी और उन्होंने इस दौरान बीकानेर शहर में आमसभा भी की और साथ ही में करणी माता के दर्शन और आमसभा भी की थी। उस जनसभा में भाजपा के पूर्व नेता देवी सिंह भाटी भी शामिल हुए और उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लिया। यह प्रचारित किया जा रहा था कि राजे उन्हें पार्टी में शामिल करा लेंगी लेकिन नजारा कुछ और ही बना अब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. पूनिया ने बीकानेर के स्थानीय सांसद और केंद्रीय संस्कृति राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है जो कि बाहरी नेताओं को भाजपा में शामिल करने का निर्णय परअपनी सिफारिश प्रस्तुत करेगी। ऐसे में अब भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं को पहले अपना पक्ष इस समिति के समक्ष रखना होगा उसके बाद उन्हें भाजपा में आने की अनुमति मिल पाएगी। ऐसी स्थिति में पूर्व सीएम राजे की रणनीति पर कुछ ब्रेक लगा है वह कोशिश कर रही थी कि किसी तरह से कुछ नेताओं को भाजपा में शामिल कराकरा कर अपना वर्चस्व पार्टी में मजबूत करें लेकिन यह संभव नहीं लग रहा है ।
फिलहाल अभी कुछ भी कहो यह बात सही है कि पूर्व सीएम राजे और प्रतिपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया के बीच आपसी समन्वय की कमी है। यह समन्वय का अभाव पार्टी में क्या स्थिति पैदा करेगा यह तो कोई बता नहीं सकता लेकिन यह निश्चित है कि आने वाले समय में भाजपा के नेताओं में आपसी संबंध में नहीं बना तो मतभेद की खाई अधिक गहरी हो जाएगी जिसे पाटना केंद्रीय नेतृत्व के लिए एक चुनौती का काम होगा। ऐसे में पार्टी के बड़े नीतिकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को निश्चित तौर पर राजस्थान में अधिक ध्यान देना पड़ेगा । नहीं तो पार्टी की एकता को कायम रखना मुश्किल हो जाएगा।