Saturday, 29 August 2026

अस्सी प्रतिशत आखों की बीमारियों का इलाज संभव: डॉ.महिपाल एस.सचदेव


अस्सी प्रतिशत आखों की बीमारियों का इलाज संभव:  डॉ.महिपाल एस.सचदेव

अक्टूबर का दूसरा गुरूवार हर वर्ष विश्व दृष्यता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों में टाली जा सकने वाली अंधता और नजर की कमजोरी के बारे में जागरूता पैदा करना है। भारत में मोतियाबिंद अंधता का सबसे बडा कारण है। इसके अलावा ग्लूकोमा और बचपन से ही अधंता दृष्टिहीनता या नजर की कमजोरी के बडे कारण है। 

सेंटर फॉर साइट के निदेशक डॉ.महिपाल एस.सचदेव का कहना है कि दुनिया भर में अंधता का सबसे बडा कारण मोतियाबिंद है, जिससे बचाव भी सम्भव है और इसका उपचार भी उपलब्ध है। तकनीक में आए क्रांतिकारी बदलावों के कारण अब ग्लूकोमा, मोतियाबिंद अैर डायबेटिक रेटीनाोपैथी जैसे अंधता के कारणों से आखों को आसानी से बचाया जा सकता है। इसके लिए रोग का समय पर पता लगना जरूरी है, क्योंकि ग्लूकोमा और डायबेटिक रेटिनोपैथी से होने वाली अंधता से बचाव तो सम्भव है लेकिन एक बार अंधता हो जाए तो उपचार सम्भव नहीं है। आंखों को बचाने के लिए इन दोनों रोगों का समय पर पता लगना बहुत जरूरी है और इसीलिए आंखों की नियमित जांच भी जरूरी है। 

भारत में मोतिायाबिंद के लाखों मामले है और ऐसे लोगों के लिए रोबोटिक फेमटोसैकंड लेजर तकनीक बहुत बडा सहारा है। इसकी प्रक्रिया की जानकारी देते हुए डॉ.सचदेव ने बताया कि यह तकनीक पूरी तरह स्वचलित है और ज्यादा सूक्ष्मता और परिशुद्धता के साथ काम करती है, जिससे बेहतर परिणााम आते है और बहुत जल्द लाभ होता है। ग्लूकोमा का उपचार सम्भव नहीं है, लेकिन इसे नियंत्रित किया जा सकता है ताकि आंखों को और ज्यादा नुकसान न पहुंचाए। विश्व दृष्यता दिवस का उद्देष्य इन कम प्रचारित लेकिन जीवन को बदल देने वाले नेत्ररोगों के बारे में लोगों को जागरूक करना ही है।

डब्ल्यूएचओ का आकलन है कि लगभग 1.5 करोड़ लोग अपवर्तक त्रुटियों (रिफ्रै क्टिव एरर) के कारण दृष्टिदोष के शिकार हैं। रिफ्रै क्टिव एरर यानी मायोपिया (निकट दृष्टिदोष), हाइपरोपिया ( दूरदृष्टिदोष) और सिलिंड्रिकल रिफ्रै क्टिव एरर (एस्टिगमैटिज्म) को डॉक्टर द्वारा सुझाए गए उचित चश्मे से दुरुस्त करना चाहिए ताकि बच्चों में धुंधली और शिथिल नजर की शिकायत न होने पाए। लेजर के जरिये नए जमाने की दृष्टि सुधार पद्धति स्माइल (स्मॉल इनशिसन लेंटिकुल एक्सट्रैक्शन) चश्मे के बगैर स्पष्ट दृष्टि प्रदान करती है। ब्लेडमुक्त और फ्लैपमुक्त पद्धति होने के कारण यह आपको झंझटमुक्त जिंदगी जीने में मदद करती है और आप चश्मे से भी छुटकारा पाते हैं। 

एक अनुमान के मुताबिक लगभग 1.9 करोड़ बच्चे दृष्टिदोष से पीडि़त है, जबकि 14 लाख बच्चों की नेत्रहीनता लाइलाज है। शिशु नेत्रहीनता के 40 प्रतिशत मामलों का बचाव या इलाज संभव है। बच्चों की गतिविधियों और आंखों पर सावधानीपूर्वक नजर रखना चाहिए ताकि उनका इलाज यथासंभव सुनिश्चित किया जा सके और उनकी बायनोकुलर दृष्टि संरक्षित करते हुए उनकी आंखों की निष्क्रियता दूर की जा सके। रेटिना रोग- औसत जीवनकाल बढऩे के कारण उम्र संबंधी मैकुलर रिजनरेशन और डायबिटीक रेटिनोपैथी जैसे रेटिना रोग की चपेट में शहरी भारतीय आबादी ज्यादा आने लगी है। टेक्नोलॉजी की तरक्की के कारण नेत्र चिकित्सा विशेषज्ञ मरीज के रोग की स्थिति और आयु को ध्यान में रखते हुए उन्हें लेजर फोटोकोगुलेशन, इंट्राविट्रियल इंजेक्शन और विट्रेक्टोमी जैसे उचित इलाज विकल्प सुझाने लगे हैं।

आंखों की सुरक्षा स्वस्थ और संतुलित खानपान से ही शुरू होती है। ओमेगा-3 फैटी एसिड, जिंक और विटामिन सी एवं ई जैसे पोषक तत्व मैकुलर डिजनरेशन और मोतियाबिंद आदि जैसी उम्र संबंधी दृष्टि समस्याओं से बचाए रख सकते हैं। धूम्रपान आपको मोतियाबिंद, ऑप्टिक नर्व डैमेज तथा मैकुलर डिजनरेशन जैसे नेत्र विकार दे सकता है। धूप में ज्यादा देर रहने और हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से आपको मोतियाबिंद होने की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए धूप में निकलने से पहले सनग्लास का इस्तेमाल जरूर करें। हर वक्त कंप्यूटर स्क्रीन से चिपके रहने के बजाय बीच-बीच में ब्रेक लेते रहें: बिना ब्रेक लिए लंबे समय तक कंप्यूटर स्क्रीन से चिपके रहने के कारण नजर धुंधली, सिरदर्द और आंखों की शुष्कता आदि की समस्या हो सकती है। अत: अपने कंप्यूटर को इस तरह रखें कि मॉनिटर आपकी आंखों के समांतर रहे। यदि संभव हो तो प्रत्येक 20 मिनट पर आंखों को आराम देने के लिए तकरीबन 20 सेकंट तक 20 फुट दूरी वाली चीजों पर नजर दौड़ाएं। प्रत्येक 2 घंटे पर कुर्सी से उठकर 15 मिनट का ब्रेक लेते रहें।



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