



बीकानेर। बीकानेर में आयोजित बीकानेर थिएटर फेस्टिवल ने शहर के सांस्कृतिक जीवन में रंग भर दिए, जहां छह दिनों तक 20 से अधिक नाटकों का मंचन हुआ और करीब 500 कलाकारों ने भाग लिया। रंग संवाद, मास्टर क्लास और 15 से अधिक नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से समाज की वास्तविक समस्याओं को मंच पर प्रस्तुत किया गया। बीकानेर के वरिष्ठ रंगकर्मी निर्मोही व्यास, सुधीर व्यास, प्रदीप भटनागर, लक्ष्मी नारायण सोनी, सुरेश हिंदुस्तानी, आनंद बी. शर्मा, कामेश्वर सहल, ओम सैनी, हरीश बी. शर्मा, मधु आचार्य और बी. नवीन शर्मा जैसे कलाकारों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए युवा रंगकर्मियों ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

फेस्टिवल के दौरान अर्जुन देव चारण का रंग संवाद भी आयोजित हुआ, जबकि रंगकर्मी ईश्वर माथुर सहित कई कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया। होली के माहौल के बीच पूरा बीकानेर शहर जहां रंगों में सराबोर था, वहीं नाटकों के माध्यम से सामाजिक सच्चाइयों को भी सामने लाया गया। विधायक जेठानंद व्यास और डॉ. विश्वनाथ मेघवाल ने भी कार्यक्रम में भाग लेकर होली के गीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में सहभागिता की।
हालांकि इस आयोजन के बहाने लेखक मनोहर चावला ने प्रशासनिक कार्यवाहियों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि कई बार अधिकारियों द्वारा मिलावटखोरी और अवैध कारोबार के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई केवल “नुक्कड़ नाटक” बनकर रह जाती है। छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई दिखाकर प्रचार तो हो जाता है, लेकिन बड़े ब्रांड और बड़े कारोबारियों पर अक्सर कार्रवाई नहीं होती। मिलावटी दूध, नकली घी, खराब खाद्य सामग्री और नकली मसालों जैसे मुद्दों पर सख्त कार्रवाई की कमी पर भी उन्होंने चिंता जताई।
लेख में स्वास्थ्य और जांच प्रयोगशालाओं की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कई पैथोलॉजी लैब्स में लाइसेंस और तकनीकी मानकों का पालन नहीं किया जा रहा, जिससे गलत जांच रिपोर्ट के कारण मरीजों के इलाज पर असर पड़ सकता है। लेखक के अनुसार प्रशासन को इन मामलों में गंभीर और पारदर्शी कार्रवाई करनी चाहिए।
लेख में बीकानेर में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं पर भी चिंता जताई गई है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार बीकानेर रेंज में हर साल करीब एक हजार लोगों की सड़क हादसों में मौत हो रही है। टूटी सड़कें, गहरे गड्ढे, ट्रैफिक अव्यवस्था, तेज गति और नाबालिगों द्वारा वाहन चलाना इन दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण बताए गए हैं।
लेखक का कहना है कि बीकानेर रंगकर्म की मजबूत परंपरा वाला शहर है और यहां के कलाकार समाज की समस्याओं को मंच पर लाकर प्रशासन को आईना दिखाते रहे हैं। लेकिन यदि इन मुद्दों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती तो यह स्थिति “गूंगे-बहरे के आगे बीन बजाने” जैसी ही रह जाती है।