



जयपुर। राजस्थान में नदियों से हो रहे अंधाधुंध बजरी खनन पर रोक लगाने के लिए राजस्थान उच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में नदी से बजरी निकालने की अनुमति देने से पहले रिप्लेनिशमेंट स्टडी (रेत की प्राकृतिक भरपाई का अध्ययन) करना अनिवार्य होगा। बिना इस वैज्ञानिक अध्ययन के किसी भी नदी क्षेत्र में बजरी खनन की अनुमति नहीं दी जा सकेगी।
कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि जिस प्रकार जंगलों को बचाने के लिए पेड़ों की कटाई से पहले उनकी ग्रोथ रेट का आकलन जरूरी होता है, उसी तरह नदियों के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए यह जानना आवश्यक है कि नदी में रेत किस गति से दोबारा जमा हो रही है। अदालत ने यह भी माना कि निर्माण कार्यों के लिए रेत एक आवश्यक संसाधन है और इस पर पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं है, लेकिन अनियंत्रित खनन से पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए कि भविष्य में होने वाली सभी बजरी नीलामियां सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की रिपोर्ट के अनुसार ही होंगी। इसके तहत लीज क्षेत्र को पांच बराबर वार्षिक ब्लॉकों में विभाजित करना होगा। एक वर्ष में केवल एक ही ब्लॉक से बजरी खनन किया जा सकेगा, जबकि शेष चार ब्लॉकों को अगले चार वर्षों तक खाली छोड़ना होगा, ताकि वहां प्राकृतिक रूप से बजरी की भरपाई हो सके। यह नियम 100 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले छोटे प्लॉट्स पर भी लागू रहेगा।
अदालत ने खनिज विभाग द्वारा नीलाम किए गए 34 बजरी ब्लॉकों में से 31 को रद्द कर दिया है। इनमें बनास नदी के बीजे-01 से बीजे-09, बीजे-13 से बीजे-23, बीजे-26 से बीजे-28, बीजे-34 से बीजे-41 तथा बीजे-42 शामिल हैं। वहीं, कोठारी नदी के मांडल क्षेत्र में स्थित बीजे-43, बीजे-44 और बीजे-47 ब्लॉकों पर फिलहाल कोई निर्णय नहीं लिया गया है। बिजौलियां क्षेत्र के भी कई बजरी ब्लॉकों को रद्द किया गया है।
हाईकोर्ट के इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे नदियों के अस्तित्व को बचाने के साथ-साथ अवैध और अनियंत्रित खनन पर प्रभावी अंकुश लगने की उम्मीद जताई जा रही है।