



लोकसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। परिसीमन से जुड़े तीन संशोधित बिलों पर दूसरे दिन भी चर्चा जारी रही, जिसमें पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद कल्याण बनर्जी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि 50% आरक्षण देना है तो इसके लिए परिसीमन की आवश्यकता ही क्या है, इसके लिए “नौटंकी” करने की जरूरत नहीं है और सभी दल इस पर सहमत हैं।
इसी बीच केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ‘महिला आरक्षण अधिनियम-2023’ को लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी है। इस कानून के तहत संसद में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है और यह 16 अप्रैल 2026 से प्रभावी माना जाएगा। यह अधिनियम पहले ही सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र में पारित किया जा चुका था।
हालांकि, इस कानून के लागू होने के बावजूद इसके वास्तविक प्रभाव को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, यह आरक्षण 2026-27 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के आधार पर ही लागू होगा, जिससे इसका प्रभाव 2034 के बाद ही देखने को मिलेगा। सरकार की ओर से यह प्रयास किया जा रहा है कि महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू किया जा सके, जिसके लिए वर्तमान में चर्चा में चल रहे तीन संशोधन बिलों को पारित करना आवश्यक है। इन बिलों पर लोकसभा में चर्चा जारी है और शाम 4 बजे मतदान होने की संभावना है।
विपक्ष ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जब संसद में इस विषय पर विस्तृत चर्चा चल रही है, तो सरकार ने कानून को इतनी जल्दबाजी में लागू क्यों किया। हालांकि सरकार का कहना है कि कानून के लागू होने की तारीख तय करना उसके अधिकार क्षेत्र में आता है, जैसा कि अधिसूचना में भी स्पष्ट किया गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में इन बिलों के पारित होने या न होने से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी के स्वरूप पर बड़ा असर पड़ सकता है।